8 में से पाठ 4 · भाषा शिक्षणशास्त्र (भाषा I और भाषा II)

पठन: पठन तत्परता, फ़ोनिक्स और समग्र भाषा उपागम, पठन के प्रकार और बोध

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पठन अर्थ-निर्माण है

पढ़ना केवल अक्षरों को ध्वनियों में बदलना नहीं है; यह पाठक के पूर्वज्ञान की सहायता से छपे हुए पाठ से अर्थ का निर्माण है। NCF 2005 चाहती है कि बच्चे बिना अर्थ के अक्षरों और शब्दों पर वर्षों लगाने के बजाय शुरू से ही अर्थ के लिए पढ़ें। नीचे से ऊपर (bottom-up) प्रक्रम अक्षरों को ध्वनियों और शब्दों में विकोडित करता है; ऊपर से नीचे (top-down) प्रक्रम पूर्वज्ञान, संदर्भ और पूर्वानुमान का प्रयोग करता है; कुशल पाठक दोनों को मिलाते हैं, जिसे अंतःक्रियात्मक मॉडल कहते हैं। स्कीमा सिद्धांत बताता है कि जिस बच्चे ने कभी रेलगाड़ी नहीं देखी, उसे रेलवे स्टेशन पर आधारित कहानी समझने में कठिनाई क्यों होती है: बोध पृष्ठभूमि-ज्ञान पर निर्भर है, इसलिए शिक्षक पढ़ने से पहले उसे तैयार करता है।

पठन तत्परता और उभरती साक्षरता

औपचारिक पठन से पहले बच्चों को मौखिक भाषा, पुस्तकों में रुचि, आकृतियों और ध्वनियों में अंतर करने की क्षमता, और ध्वनि-जागरूकता (phonological awareness) चाहिए, यानी शब्दों में तुक, अक्षर (syllable) और अलग-अलग ध्वनियाँ पहचानने की क्षमता। उन्हें मुद्रण की अवधारणाएँ (concepts about print) भी चाहिए: कि छपे शब्द अर्थ रखते हैं, किताब कैसे पकड़ी जाती है, हिंदी और अंग्रेज़ी बाएँ से दाएँ और ऊपर से नीचे पढ़ी जाती हैं, और शब्दों के बीच खाली स्थान होता है। मैरी क्ले ने इस आरंभिक ज्ञान के लिए उभरती साक्षरता (emergent literacy) शब्द का प्रयोग किया, जिसे बच्चे औपचारिक शिक्षण से बहुत पहले साइनबोर्ड, पैकेटों और कहानी की किताबों से बनाते हैं। इसलिए तत्परता की केवल प्रतीक्षा नहीं की जाती, उसे कविताओं, ध्वनि-खेलों, चित्र-पठन, कहानी-सत्रों और आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींचने (scribbling) से विकसित किया जाता है।

फ़ोनिक्स, समग्र भाषा और हिंदी की विधियाँ

फ़ोनिक्स (ध्वनि-आधारित विधि) अक्षरों और ध्वनियों का संबंध और ध्वनियों को जोड़कर शब्द बनाना सिखाती है (क-म-ल, कमल); यह नीचे से ऊपर का उपागम है जो बच्चों को अपरिचित शब्द पढ़ने की कुंजी देता है। देखो और कहो (look-and-say) विधि पूरे शब्दों को देखकर पहचानना सिखाती है। समग्र भाषा उपागम (whole language), जो केनेथ गुडमैन से जुड़ा है, जिन्होंने पठन को मनोभाषिक अनुमान का खेल (1967) कहा, अर्थपूर्ण पाठों और बच्चों की अपनी भाषा से आरंभ करता है और मानता है कि विकोडन के कौशल अर्थपूर्ण पठन के भीतर ही विकसित होते हैं। आज व्यापक रूप से अनुशंसित संतुलित उपागम व्यवस्थित फ़ोनिक्स को अर्थपूर्ण पठन से जोड़ता है। हिंदी शिक्षण की पुस्तकें विधियों को संश्लेषणात्मक, अर्थात् अंश से पूर्ण की ओर (वर्ण विधि, ध्वनि विधि, अक्षर विधि), और विश्लेषणात्मक, अर्थात् पूर्ण से अंश की ओर (शब्द, वाक्य और कहानी विधि), में बाँटती हैं। देवनागरी अधिकांशतः ध्वन्यात्मक है, इसलिए ध्वनि-आधारित विधियाँ अच्छा काम करती हैं, पर उन्हें शीघ्र ही अर्थपूर्ण शब्दों और वाक्यों तक ले जाना चाहिए।

पठन के प्रकार

सस्वर पठन (ज़ोर से पढ़ना) आरंभिक पाठकों के उच्चारण, प्रवाह और भाव-अभिव्यक्ति में सहायक है और शिक्षक को कठिनाइयाँ सुनने देता है; शिक्षक का स्वयं का आदर्श वाचन हर चरण पर उपयोगी है। मौन पठन तेज़ होता है, ध्यान अर्थ पर रखता है और वयस्क इसी तरह पढ़ते हैं, इसलिए बच्चे बड़े होने के साथ इसकी ओर बढ़ते हैं। गहन पठन (intensive reading) किसी छोटे पाठ, जैसे पाठ्यपुस्तक के पाठ, का विस्तृत समझ और भाषा की विशेषताओं के लिए बारीकी से अध्ययन है; विस्तृत पठन (extensive reading) आनंद और सामान्य समझ के लिए अनेक लंबे पाठ पढ़ना है, जैसे पुस्तकालय की किताबें, और इससे प्रवाह, शब्द-भंडार और पढ़ने की आदत बनती है। स्किमिंग (सरसरी पठन) मुख्य भाव के लिए तेज़ी से पढ़ना है, जैसे किसी समाचार पर एक नज़र डालना; स्कैनिंग (खोजपूर्ण पठन) किसी एक जानकारी को खोजना है, जैसे सूची में कोई नाम या समय-सारणी में कोई रेलगाड़ी ढूँढना।

बोध का निर्माण

बोध पढ़ने से पहले, पढ़ते समय और पढ़ने के बाद बनता है। पढ़ने से पहले शिक्षक पूर्वज्ञान जगाता है, कुछ मुख्य शब्दों से परिचय कराता है और बच्चों से शीर्षक और चित्रों से अनुमान लगाने को कहता है। पढ़ते समय बच्चे अपने अनुमान जाँचते हैं, प्रश्न पूछते हैं, मन में चित्र बनाते हैं और पाठ को अपने जीवन से जोड़ते हैं, और शिक्षक ज़ोर से सोचकर (think aloud) दिखा सकता है कि अच्छा पाठक कठिन वाक्य को कैसे समझता है। पढ़ने के बाद बच्चे पुनर्कथन, सारांश, चर्चा या नाट्यीकरण करते हैं या लिखित प्रतिक्रिया देते हैं। प्रश्न शाब्दिक (उत्तर पाठ में लिखा है) से आगे बढ़कर अनुमानात्मक (पंक्तियों के बीच पढ़ना) और मूल्यांकनात्मक (परखना और प्रतिक्रिया देना) स्तर तक जाने चाहिए, और कुछ प्रश्न मुक्त-उत्तरीय (open-ended) होने चाहिए। जो बच्चा धाराप्रवाह पढ़ता है पर प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाता, उसकी समस्या बोध की है, विकोडन की नहीं।

प्रिंट-समृद्ध कक्षा

प्रिंट-समृद्ध वातावरण बच्चों को ऐसी अर्थपूर्ण छपी सामग्री से घेरता है जिसका वे प्रयोग कर सकें: दरवाज़े और श्यामपट्ट जैसी वस्तुओं पर नाम-पट्टियाँ, नाम-कार्ड, कैलेंडर और मौसम-चार्ट, शब्द-दीवार, कविताओं के चार्ट, बच्चों का अपना लेखन और शीर्षक सहित चित्र, समाचार पत्र, तथा चित्र-पुस्तकों और बड़ी किताबों (big books) वाला पठन-कोना। विद्यालय की भाषा के साथ बच्चों की घर की भाषाओं में लगी नाम-पट्टियाँ बहुभाषी शिक्षार्थियों की मदद करती हैं। छपी सामग्री बच्चों की आँखों के स्तर पर हो, बार-बार बदली जाए और वास्तव में प्रयोग हो: शिक्षक उसकी ओर इशारा करे और बच्चों को उसे पढ़ने के लिए आमंत्रित करे। बड़ी किताब से साझा पठन (shared reading), जिसमें शिक्षक उँगली रखकर पढ़ता है और बच्चे साथ जुड़ते हैं, छपाई की दिशा दिखाता है और बोली को लिखित रूप से जोड़ता है।

CTET क्या पूछता है

पठन का उद्देश्य बोध है; प्रिंट-समृद्ध वातावरण उभरती साक्षरता को बढ़ावा देता है; स्किमिंग मुख्य भाव के लिए और स्कैनिंग विशिष्ट विवरण के लिए है; विस्तृत पठन आनंद के लिए होता है और पढ़ने की आदत बनाता है; और अच्छे प्रश्न बच्चों को पाठ से पंक्तियाँ उतारने के बजाय सोचने पर विवश करते हैं।

मुख्य तथ्य

  • नीचे से ऊपर पठन: अक्षर से ध्वनि, ध्वनि से शब्द, शब्द से अर्थ; ऊपर से नीचे पठन: पूर्वज्ञान और पूर्वानुमान; कुशल पाठक दोनों का प्रयोग करते हैं (अंतःक्रियात्मक मॉडल)।
  • पठन तत्परता: मौखिक भाषा, ध्वनि-जागरूकता (तुक, अक्षर, ध्वनियाँ), मुद्रण की अवधारणाएँ, दृश्य विभेदन और पुस्तकों में रुचि।
  • उभरती साक्षरता (मैरी क्ले): बच्चे औपचारिक शिक्षण से पहले ही छपी सामग्री के बारे में बहुत कुछ जानते हैं; प्रिंट-समृद्ध वातावरण इसे बढ़ाता है।
  • फ़ोनिक्स अक्षर-ध्वनि संबंध और ध्वनियों को जोड़ना सिखाता है; समग्र भाषा उपागम (केनेथ गुडमैन: पठन मनोभाषिक अनुमान का खेल, 1967) अर्थपूर्ण पाठों से आरंभ करता है; संतुलित साक्षरता दोनों को जोड़ती है।
  • हिंदी पठन विधियाँ: संश्लेषणात्मक, अंश से पूर्ण (वर्ण, ध्वनि, अक्षर विधि); विश्लेषणात्मक, पूर्ण से अंश (शब्द, वाक्य, कहानी विधि)।
  • सस्वर पठन: आरंभिक कक्षाओं में उच्चारण और भाव; मौन पठन: गति और बोध; गहन पठन: छोटे पाठ का बारीक अध्ययन; विस्तृत पठन: आनंद के लिए व्यापक पठन।
  • स्किमिंग: किसी समाचार को उसका मुख्य भाव जानने के लिए तेज़ी से पढ़ना; स्कैनिंग: परिणाम सूची में अपना अनुक्रमांक खोजना।
  • बोध के स्तर: शाब्दिक (लिखा हुआ), अनुमानात्मक (निहित), मूल्यांकनात्मक (परखा हुआ); मुक्त-उत्तरीय प्रश्न भी पूछें।
  • प्रिंट-समृद्ध कक्षा: नाम-पट्टियाँ, नाम-कार्ड, शब्द-दीवार, चार्ट, बच्चों का अपना लेखन, पठन-कोना और बड़ी किताबें, आँखों के स्तर पर और प्रयोग में।

एक नज़र में दोहराव

पठन अर्थ-निर्माण है (NCF 2005); नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे, अंतःक्रियात्मक; स्कीमा सिद्धांत; तत्परता: मौखिक भाषा, ध्वनि-जागरूकता, मुद्रण की अवधारणाएँ; उभरती साक्षरता (मैरी क्ले); फ़ोनिक्स बनाम समग्र भाषा (गुडमैन 1967), संतुलित साक्षरता; हिंदी: संश्लेषणात्मक बनाम विश्लेषणात्मक विधियाँ; सस्वर, मौन, गहन, विस्तृत; स्किमिंग = मुख्य भाव, स्कैनिंग = विवरण; पढ़ने से पहले, दौरान, बाद; शाब्दिक, अनुमानात्मक, मूल्यांकनात्मक; प्रिंट-समृद्ध कक्षा, बड़ी किताबें।

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